शनिवार, 29 नवंबर 2008

किस बात का है इंतजार ?

देश की अखंडता, स्वतंत्रता और संप्रभुता पर आये दिन प्रत्यक्ष–अप्रत्यक्ष हमले हो रहे हैं, मुंबई में चला 60 घंटे का गोरिल्ला युद्ध देखने के बाद, सबकुछ जानते हुए भी शीर्ष नेतृत्व अनदेखी कर रहा है.
आज जरूरत है सख्त निर्णय लेने की, देश की सुरक्षा की, अखण्डता बनाये रखने की.

11 सितम्बर को जब ट्रेड सेंटर पर हमला हुआ तो अमेरिकन मीडिया द्वारा इसे युद्ध के रूप में प्रचारित किया गया तथा अमेरिकन सरकार ने इसकी जड़ तक जाते हुए अफगानिस्तान में आतंकवाद के ख़िलाफ़ एक तरफा कार्यवाही करते हुए आतंकवादियों के ठिकानों को नष्ट कर दिया.

भारत इस आतंकवाद से कई सालों से पीड़ित है, कई बार हमारी अस्मिता पर हमले किये गये परन्तु आज तक कभी कोई ठोस निर्णय इस जड़ को उखाड़ फेंकने हेतु नहीं लिया गया.

आतंकवादियों द्वारा गिन–गिन कर मंदिर, मस्जिद, गिरिजा, गुरूद्वारों पर हमले, चुन–चुन कर महानगरों में बम ब्लास्ट, भारतीय लोकतंत्र की तस्वीर संसद पर अटेक या फिर अब मुंबई में नापाक इरादे, आये दिन इनकी गतिविधियाँ बढ़ती जा रही है.

इतना सब होने के बाद भी शीर्ष नेतृत्व चुप क्योंहैं ?????
क्या हमें अपनी अस्मिता, एकता, अखंडता और संप्रभुता की रक्षा का अधिकार नहीं है ?????
क्या हम और कोई बड़ी घटना का इंतजार कर रहे हैं ?????

नहीं अब बहुत हो चुका ! अब हमें इंदिरा गाँधी या अमेरिकन सरकार की तरह सख्त व कठोर निर्णय लेने होंगे और इस "गाजर घास" को जड़ से खत्म करना ही होगा । भारतीय सीमा से लगे ऐसे ठिकाने जहाँ पर ऐसे दहशतगर्दों को तैयार किया जाता है, जहाँ से ऐसी गतिविधियाँ संचालित की जाती हैं उन ठिकानों का नामोनिशान मिटाना ही होगा.

इस अवसर पर राष्ट्र कवि हरिओम पँवार की ये पँक्तियाँ अब भी प्रासंगिक हैं –

"बारूदी अंगारे लेकर, सीमा रेखा लाँघ चुका,
कस्मे–वादे, प्यार–वफा सब, खूँटी पर टाँग चुका,
तो तुम भी घातों का निर्णय, एक बार हो जाने दो,
एक "वार" सीमा रेखा के, आर–पार हो जाने दो..."

2 टिप्‍पणियां:

डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

भाईसाहब शानदार लिखा है,निसंदेह प्रभावशाली कलम है आपकी,लगे रहिये इसी तरह का धारदार लिखने में.......

Ajay Goyal ने कहा…

निसंदेह इस युग में नेताओं ने देश को गिरवी रख दिया है, अब उम्मीद केवल जनता एवं देश की रक्षा करने वालों से है. शहीदों की शहादत पे कुछ पंक्तियाँ दोहरा रहा हूँ...

शहीदों की चिता पर हर बरस लगेंगे मेले,
वतन पर मिटने वालों का यही निशाँ होगा.

दिलीप जी आप बधाई के पात्र हैं. में आपकी भावनाओं की क़द्र करता हूँ. ये जज्बा कभी ख़त्म मत होने देना...

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